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अभी से ही गरीबों को इतना अपमान तो एमपी बनने के बाद नालंदा लोकसभा से महागठबंधन प्रत्याशी अशोक आजाद क्या देगा सम्मान

नालंदा राजनीति
जनादेश न्यूज़ नालंदा (राजीव रंजन 9304117882)
👉गरीबों और अति पिछड़ों की लड़ाई तथा सम्मान की करते हैं बात,मगर उसी गरीबों से पहनबातें हैं जूता-मौजा
एक पुरानी कहावत है कि “”चाचा के भरोसे गोमसगिरी”” और इस कहावत को चरितार्थ करने पहुंचे हैं नालंदा लोकसभा संसदीय क्षेत्र से महा गठबंधन के प्रत्याशी अशोक आजाद चंद्रवंशी. जी हां चौंकिएगा नहीं हकीकत तो यह है कि गया जिले के मूल निवासी अशोक आजाद चंद्रवंशी के चाचा बादशाह आजाद आरजेडी के एमएलसी रह चुके थे जिनका राजनीतिक गलियारों में नालंदा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. नालंदा लोकसभा संसदीय क्षेत्र से महागठबंधन के प्रत्याशी अशोक आजाद की भी राजनीतिक गलियारों में दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है हद तो यह है कि कभी वार्ड का चुनाव भी नहीं लड़ने वाले लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं यानी यह कहना गलत नहीं होगा की जिसने कभी छोटी सी नहर नहीं पार कर सका उसे अचानक समुद्र पार करने का दायित्व मिल गया हो. खैर नालंदा की जनता जाने इन्हें समुद्र पार कराएगी या बीच नहर में ही डूबा देगी?
आपको बता दें कि अभी से ही अशोक आजाद चंद्रवंशी गरीबों का अपमान कर रहा तो एमपी बनने के बाद क्या सम्मान देगा?
आपको बता दें कि महागठबंधन के घटक दल के सभी वरिष्ठ नेता बिहार के उन गरीबों दलित महादलित पिछड़ा अतिपिछड़ा के हक सम्मान और उत्थान के लड़ाई की बात खुले मंच से पूरे बिहार में घूम घूम कर कर रहे हैं. खैर नालंदा में तो इन के हक की लड़ाई की बात जोरों से जारी है समाज के अंदर दबे कुचले के हक और सम्मान की बात करने वाले नालंदनालंद29 लोकसभा संसदीय क्षेत्र से महागठबंधन के अतिपिछड़ा उम्मीदवार अशोक आजाद चंद्रवंशी की घड़ियाली आंसू की हकीकत तब सामने आ गई जब अशोक आजाद चंद्रवंशी अपने पैरों में पहनने वाले जूते और मौजा को भी अपने गरीब और कमजोर असहाय स्टाफ से पहनवाते हैं.
अब जरा सोचिए जो गरीबों के हक सम्मान और उनके उत्थान की बात करता हो तो ऐसे प्रत्याशी सांसद बनने के बाद इन गरीबों को क्या सम्मान देगा?
नालंदा से महागठबंधन के हम पार्टी जीतन राम मांझी के प्रत्याशी अशोक आजाद चंद्रवंशी का जब अभी से ही ऐसा आचरण है तो अगर संजोग से उन्हें एमपी का कुर्सी मिल गई तो क्या होगा?
हालांकि महागठबंधन में ही काफी लोग अशोक आजाद के खिलाफ हैं ऐसे लोगों का मानना है कि नालंदा ज्ञान की धरती है यहां ज्ञानी और विद्वान लोग रहते हैं. गौरतलब है कि 2014 के मोदी लहर में भी अतिपिछड़ा उम्मीदवार को नालंदा लोकसभा सीट गवानी पड़ी थी और यदि इस सीट पर अपनी प्रतिष्ठा बचाई थी.
इस बार देखना यह दिलचस्प होगा कि राजनीतिक गलियारों से दूर-दूर तक नाता नहीं रखने वाले महागठबंधन के प्रत्याशी को नालंदा की जनता समुद्र पार कराएगी या बीच नहर में ही डूबआएगी या कौशलेंद्र कुमार को हैट्रिक का मौका देगी?

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