“एक था लालू” जिसके कारस्तानीओ की वजह से बिहार में लोग अपना सरनेम लगाना छोड़ दिए,जिसने नाम से ज्यादा खुद की पहचान से डरना सिखा दिया था

पटना बिहार
जनादेश न्यूज़ बिहार
पटना : हर जिंदा काम अपना इतिहास कैसे भूल सकती है बीता हुआ कल कोई कैसे भूल पाएगा. इसलिए पीछे झांकना जरूरी हो जाता है ताकि आने वाली पीढ़ी वह गलती ना दोहराए. जो उनके पुरखों ने दोहराया. गोपालगंज के धूसर मिट्टी से निकलकर बिहार के सियासत के डीएनए को बदल देने वाला पॉलिटिक्स का इकलौता आयाम था “लालू” सिस्टम के सर पर जाति की धमक से सवार बिहार के हाल को बेहाल करने वाला माई का लाल था लालू, लालू लाल था ,लालू काल था, समाज के माथे पर मढ़ा एक अनकहा सवाल था “लालू” गरीबों का मसीहा पिछड़ों का पोस्टर बॉय लालू कमाल था.
90 के दशक का इकलौता बवाल था लालू. सब था लालू पर आज 2019 की चिलचिलाती गर्मी में लोकसभा इलेक्शन के गुब्बार थमने के बाद बिहार के चप्पे-चप्पे में बस एक बात गूंज रही है कि एक था “लालू” जिसकी पॉलिटिकल कहानियां अब किस्सों के काम आएगी की एक था लालू.जो अब शायद अतीत के पन्नों कि वो धूमिल कहानी है जो शायद अब कोई पलटना जरूरी ना समझे.लालू वह सख्त है जिसे आप ना करना चाहोगे भी तो नकार नहीं सकते क्योंकि उसने एक पीढ़ी के साथ खिलवाड़ किया. हर उस तरीके से जिससे वह कर सकता था. फिर चाहे रिक्शा में बैठकर विधानसभा जाने की ठसक हो या बीच दियारा में चुनावी दौरों के दौरान हेलीकॉप्टर उतार चरवाहों को हेलीकॉप्टर ट्रिप करवा वोट बैंक में तब्दील करने की कारस्तानी. लालू ने वो किया जो पहले किसी ने नहीं किया. करना छोड़िए सोचा भी नहीं होगा. उसने राजनीति के प्रचलित तौर-तरीकों को सर के बल खड़ा कर दिया. चाहे अपने मछलियों को चारा खिलाते कहना हो हराओ बीजेपी को हराओ या भंटा बैगन तोड़ते हुए आईएएस आईपीएस की मीटिंग लेना. उसने चलती बसों में टिकट लिए पिता को सीट से उठा स्टूल पर बैठा देने की ताकत थी. अपने लोगों को और दूध पीने वाले उम्र बच्चे को लाठी में तेल पिला रैली करने तालीम दे डाली. मूर्ख हैं वे लोग जो कहते हैं उसने रोजगार नहीं दिया.अरे भाई बंदूक माफिया,कोयला माफिया,शार्प शूटर,किडनैपिंग अब एक आदमी कितना इंडस्ट्रीज स्थापित करेगा. आलू और तिलहन के बदले उसने बंदूक और बारूद की खेती लगवाई. एक शख्स था जिसके दम पर जातियों ने जातियों से बदला लेने के तालीम ली अपने मुंह में गुल दबाए दबाए जनता दरबार में पढ़े लिखे लोगों को बौना साबित करते रहना और चारा चारा का शोर बुलंद हुआ तो भरे बाजार में राबड़ी देवी को किचन से खींचकर निकालना और पूरे बिहार का सिरमौर बना देना. महिला सशक्तिकरण का इससे बड़ा उदाहरण तो हो ही नहीं सकता. लालू बिहार की राजनीति का वह न्यूटन था जिसने पॉलिटिक्स के रूल बना डालें. वो धोनी था जिसके हेलीकॉप्टर शॉट का वर्षों तक किसी पार्टी को जवाब नहीं था.

लेकिन सर जी पब्लिक है और पब्लिक तो सब जानती है. हिसाब तो लेगी आपके कर्मों का उन कारस्तानीओ का जिसकी वजह से बिहार में लोग अपना सरनेम लगाना छोड़ दिए. अंकित सिंह अंकित आनंद हो गए प्रीति सिंह प्रीति राज हो गई लोग अपनी टाइटल में राज लगाकर अपनी जाति को राज ही रहने देना चाहते थे .आपको क्या लगता है बिहारी लोगों को शौक था नाम के आगे दो दो नाम लगाने का वो तो एक था लालू. जिसने नाम से ज्यादा खुद की पहचान से डरना सिखा दिया था. वक्त का चक्का बदलते देर नहीं लगती और उंगली की स्याही कभी न्याय से परहेज नहीं करती कि एक जमाने में पीएम और सीएम बनाने वाला शख्स आज जेल की चारदीवारीयों में कैद अपने सुनहरे अतीत को याद करके ठंडी आहे ले रहा है. और अपनी पार्टी का सूपड़ा साफ होते हुए देख रहा है. आज याद तो आती होगी विधानसभा की बह महफिले और वेटरनरी कॉलेज का वो राज पाठ जहां सजायाफ्ता हो के भी बिहार का एकलौता किंग था.आज याद तो आती होगी तेजाब में नहाए हुए उन मजलूम की चीखे और शंकर बीघा में काटे गए उन गरीबों और उन मासूमों की आह जिसने उसे मरने दिया सिर्फ और सिर्फ इसीलिए कि अपने-अपने मुखिया और शहाबुद्दीनो के दम पे उसने सियासत की शतरंज में लाशों की दाव चलाता रहा. आज याद तो आती होगी उस बदहाल कॉलेज और स्कूल की तस्वीरें जिसको उसने सड़ने दिया सिर्फ इसलिए कि वह उसके पॉलिटिक्स के डिक्शनरी में एक नासूर लगते थे. पर फिर भी इन सबके बाद एक था लालू यह कहना अपने आप में सवाल पूछने जैसा है. क्योंकि बिहार की पॉलिटिक्स को समझना उड़ती चिड़ियों के पैर में हल्दी लगाने जैसा है.तो बचा के रखिए अपने-अपने प्रश्नवाचक चिन्ह ? और खुश हो जाइए इस सत्ता परिवर्तन के बयार में क्योंकि क्या पता कल फिर पता चले कि लालू तो अभी जिंदा है. उसी गोपालगंज की मिट्टी कि धुसर जमीन पर भैंस चराते किसी बच्चे के दिल में जिसे बाबू साहब ने आज फिर स्कूल आते हुए लताड़ा होगा कि लालू तो जिंदा है. अपनी बेरोजगारी का ठीकरा मोदी सरकार पर फोड़ने वाले उन लाखों युवाओं को दिल में खुश हो लीजिए इस भरम में कि शायद सब बदल गया है और फिर कभी किसी को अपना सरनेम छुपाने की नौबत नहीं आए.क्योंकि THISH IS NEW INDIA क्योंकि यहां जात पात पर विकास भारी है.अगले ही साल फिर किसी तेल पीलावन रैली में अगर हमारी भेंट होगी तो यह मत कहिएगा की एक था “लालू” क्योंकि क्या पता आपके नुक्कड़ और पान दुकान पर पता चले कि लालू अभी जिंदा है.