निर्वाचन आयोग ने देश में आम चुनावों की घोषणा 16 मार्च को की और दो दिन बाद 18 मार्च को छह राज्यों के मुख्य सचिवों के कार्यकारी अधिकार छीन लिए। ये सभी मुख्य सचिव अब लोकसभा चुनाव की पूरी प्रक्रिया से दूर रहेंगे। देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) राजीव कुमार ने अपने आदेश में पश्चिम बंगाल के पुलिस प्रमुख (DGP) को भी चुनाव प्रक्रिया से दूर कर दिया है। कुल मिलाकर कहें तो चुनाव आयोग ने इन अधिकारियों को नामांकन, मतदान और परिणाम आने तक उनके पद से हटा दिया है। वो लोकसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद फिर से अपने-अपने पदों पर बहाल हो जाएंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव आयोग को बड़े-बड़े अधिकारियों को हटाने का अधिकार कब और कहां से मिलता है और वह कैसे तय करता है कि किस अधिकारी पर कार्रवाई की जाए।
सबसे पहले यह जान लें कि निर्वाचन आयोग के गठन का निर्देश हमारे संविधान में दिया गया है। यानी निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है। संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयोग के दायित्वों की चर्चा है। इस अनुच्छेद में निर्वाचक नामावली के रख-रखाव तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से निर्वाचनों के संचालन की निर्वाचन आयोग की शक्तियों और कार्यों का उपबंध है। अनुच्छेद 324(1) कहता है, ‘निर्वाचन नामावलियों की तैयारी का सुपरविजन, डायरेक्शन एवं नियंत्रण और संसद एवं प्रत्येक राज्य की विधानसभा के सभी चुनावों का संचालन के अलावा इस संविधान के तहत आयोजित भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनाव संपन्न कराने का अधिकार एक आयोग (निर्वाचन आयोग) में निहित होगा।’
निर्वाचन आयोग को संविधान से मिली इन जिम्मेदारियों और शक्तियों पर गौर करें तो पता चलता है कि उसे साफ-सुथरा चुनाव संपन्न करवाने के लिए कानून-व्यवस्था को अपने हिसाब से चुस्त-दुरुस्त करने का अधिकार प्राप्त है। इसी अधिकार का उपयोग करते हुए निर्वाचन आयोग चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ तालमेल से काम करता है। निर्वाचन आयोग और एजेंसियों के बीच इस तालमेल से निम्नलिखित उद्देश्य पूरे होते हैं…
भारत का चुनाव आयोग (ECI) स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने के लिए चुनाव अवधि के दौरान कानून और व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके लिए निर्वाचन आयोग ये कदम उठाता है…