कोरोना महामारी के खिलाफ कोविशील्ड टीका बनाने ब्रिटिश फॉर्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने कोर्ट में पहली बार यह माना है कि इस वैक्सीन के रेयर साइड इफेक्ट होते हैं। इस वैक्सीन को लगवाने वालों में थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम के साथ थ्रोम्बोसिस (TTS) की दुर्लभ समस्या हो सकती है। इस वजह से शरीर में खून के थक्के बनने लगते हैं और प्लेटलेट्स कम बनती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इससे ब्रेन स्ट्रोक और हार्ट अटैक की समस्या बढ़ जाती है। दरअसल, यह टीका बनाने वाली ब्रिटिश कंपनी टीके के साइड इफेक्ट को लेकर लंदन की एक अदालत में आरोपों का सामना कर रही है। भारत में यह वैक्सीन करोड़ों लोगों को लगाई जा चुकी है। यहां इसे सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने विकसित किया है। इस खुलासे के बाद से भारतीय लोग टेंशन में हैं, जो सोशल मीडिया पर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं।
यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, साइड इफेक्ट को एडवर्स रिएक्शंस भी कहते हैं। यानी किसी दवा या टीके के अनचाहा और अवांछित असर। साइड इफेक्ट्स मामूली भी होता है और जानलेवा भी। डॉक्टरों के अनुसार, कोई भी दवा या वैक्सीन हो, सबके साइड इफेक्ट्स होते हैं। ज्यादातर मामलों में साइड इफेक्ट्स से नाक से पानी बहना, पेट खराब होना से लेकर त्वचा में खुजली और रैशेज हो सकता है। कुछ से एलर्जी भी होती है। हालांकि, कुछ दवाओं और वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स के गंभीर नतीजे भी होते हैं। कभी खून के थक्के बन जाते हैं तो कभी इंटरनल ब्लीडिंग तक हो जाती है। खांसी की सीरप वगैरह में अक्सर एलर्जी की शिकायत देखने को मिलती है। डॉ. रविकांत चतुर्वेदी, इंटरनल मेडिसिन के अनुसार, जैसे आप प्रोटीन के लिए दाल खाते हैं। लेकिन, इसका बाई प्रोडॅक्ट नाइट्रोजनस सब्सटेंस निकलता है, जो पेशाब के रास्ते बाहर कर दिया जाता है। अगर, ये चीजें न निकलें तो आपकी किडनी बैठ सकती है। यही साइड इफेक्ट्स है। आप एंटी बायोटिक्स लेते हैं तो आपके शरीर के अच्छे और खराब दोनों तरह के बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं। इसका साइड इफेक्ट यह हुआ कि आपको फायदा पहुंचाने वाले बैक्टीरिया भी मारे गए। इससे शरीर की इंटरनल फंक्शनिंग पर असर पड़ता है।
यूएस फूड एंड ड्रग एडिमिनिस्ट्रेशन और सेंटर फॉर बायोलॉजिक्स इवैलुएशन एंड रिसर्च के अनुसार, किसी भी टीके को विकसित होने में 10 से 15 साल लगते हैं। मगर, कोरोना महामारी के दौर में इसे एक साल से भी कम समय में वैक्सीन मार्केट में उतार दी गई। हालांकि, उस समय भी इसके साइड इफेक्ट्स की गंभीरता का ख्याल रखा गया था। वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया कुछ ऐसी है, जिसे ग्राफिक से समझते हैं।
डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार, दुनिया में कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है। किसी का कम या ज्यादा हो सकता है। ऐसे में बेवजह का हो-हल्ला किया जा रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वाइरोलॉजी के डॉक्टरों के अनुसार, जिन लोगों को कोरोना हुआ, उसका साइड इफेक्ट कुछ हफ्ते, महीने या सालों बाद भी दिख सकते हैं। दरअसल, यह वायरस खुद को आनुवंशिक रूप से म्युटेट यानी खुद को बदलता रहा है। इसके कई वैरिएंट यानी रूप हैं। ऐसे में जब कोई दवा इससे निपटने के लिए बनती है तो इसके कुछ समय बाद ही इसने अपना रूप बदल लिया तो ऐसे में यह दवा या वैक्सीन बेअसर हो गई। यह वायरस अपना रूप किस तरह बदलता है, जब तक इसका राज खुल नहीं जाएगा, तब तक मुकम्मल वैक्सीन बना पानी मुश्किल है।
यह एक हकीकत है कि कोरोना महामारी के बाद से हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक के मामले काफी बढ़ गए। कोई वैक्सीन बनाने में आमतौर पर 10 से 15 साल तक लग जाते हैं। संकटकाल के समय पूरी दुनिया में कोरोना महामारी से निपटने के लिए फटाफट वैक्सीन बनाई गई। यह महज भारत की बात नहीं है। उस समय यह देखा गया कि ऐसी वैक्सीन बने जिसका कम से कम साइड इफेक्ट हो और यह ज्यादा से ज्यादा महामारी के खिलाफ कारगर हथियार बन सके।