पुरी की रथयात्रा तो पूरी दुनिया के लिए आकर्षण और श्रद्धा का विषय है, लेकिन क्या आपको पता है कि कानपुर की रथयात्रा का भी ऐतिहासिक महत्व है। इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि कानपुर में 1810 के आसपास रथयात्रा निकालने की शुरुआत हुई थी। उसके बाद से यह क्रम लगातार जारी है। इतिहासकार मनोज कपूर ने बताया कि कानपुर में दो दिनों तक रथयात्रा निकलती है। पहले दिन बाईजी मंदिर से भव्य रथयात्रा निकलती है, तो दूसरे दिन बिरजी भगत के मंदिर से पूरी भव्यता से निकल महाप्रभु जगन्नाथ नगर भ्रमण करते हैं। कानपुर की इस ऐतिहासिक रथयात्रा में आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र देसी वाद्ययंत्रों के साथ नाचते-गाते युवकों की टोलियां होती हैं। यात्रा को देखने के लिए मुख्य शहर में भारी भीड़ उमड़ती है।
जनरलगंज में 1810 में बिरजी भगत ने भगवान जगन्नाथ का मंदिर बनवाया। यहां अष्टधातु की मूर्ति लगी। भगत का परिवार शोभायात्रा निकालने में माहिर माना जाता था। किंवदंती है कि 25-30 साल बाद बाईजी नाम की महिला ओडिशा से भगवान की काष्ठ (लकड़ी) की मूर्ति बैलगाड़ी से लेकर राजस्थान जा रही थीं। बैलगाड़ी कानपुर पहुंची और रुक गई। तमाम प्रयासों के बावजूद रथ आगे नहीं बढ़ा तो बाईजी ने बैलगाड़ी रुकने की जगह पर ही मूर्तियां स्थापित कर मंदिर बनवा दिया। इसे ही जनरलगंज के बाईजी मंदिर के नाम से पहचाना जाता है।इसके बाद यहां से भी आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथयात्रा आयोजन का क्रम शुरू हुआ। काफी वक्त पहले बिरजी भगत मंदिर में झगड़े के कारण रथयात्रा नहीं निकली, लेकिन 80 के दशक में झगड़ा खत्म हुआ। अब पहले दिन बाईजी और दूसरे दिन बिरजी भगत मंदिर की यात्रा निकलती है। वैश्य समाज के कई मंडल भी यात्रा में सक्रिय रूप से शामिल होते हैं।